ghazal
हमनवा है यही शजर मेरा घोंसले की तरह है घर मेरा. हाथ जो तुमने थाम रक्खा है हाथ होता वही अगर मेरा. मेरी बनती नहीं किसी से भी है जियादा मिजाज खर मेरा. रास्ता दे दिया पहाड़ों ने आ के देखे कोई असर मेरा. ऊब लगती है रास्तों से अब याद आता है मुझको घर मेरा. एक हो तो समेट लूं पाली है यहां सब तितर बितर मेरा. वो खुला ही नहीं कभी मुझ पर काम आया न कुछ हुनर मेरा. हड़बड़ी में रखा कहां मैंने कार्ड सुख का गया किधर मेरा. लग रहा है कि जाहिलों के हाथ तन से होगा जुदा ये सर मेरा. अब पराए से भी पराया है था किसी वक्त यह शहर मेरा. #रमेश पाली